मिथिलांचल मे एक कहावत प्रचलित अछि "जे नञि बाजथि निज भाषा मैथिली, मोन होइए कान पकड़ि ऐंठि ली ।" उक्त कहावत मिथिलाक प्रिय भाषा आ जन-जन मिथिलावासीक हृदयक भाषा मैथिलीक प्रति लगाव व भावपूर्ण उन्मुकतता कें सद्यः निरूपित करैत अछि ।

वस्तुतः एहि कहावतक परिपेक्ष्य मे मैथिली भाषाक प्रति अनुराग, प्यार, स्नेह, ममत्व आओर अपनत्वक लगाव विलक्षण रूप सँ लक्षित होइत अछि । कोनो प्रकारक भाषा व्यक्तिक संस्कार कें संस्कारित करैत जीवन मे भव्यता तथा दिव्यता कें प्रखर बनवैत अछि । परन्तु वर्तमान सामाजिक परिवेश मे तथा आधुनिकताक तामझाम मे अधिकांशतः तथाकथित स्वघोषित मैथिल व्यक्ति द्वारा स्वयं कें श्रेष्ठ साबित करबाक हेतु एवं समाज मे सम्मान, यश एवं प्रतिष्ठा प्राप्त करबाक ललक माइट-पाइनक भाषा, मायक भाषा, पितामह-परपितामहक भाषा तथा पूर्वज पदत्त प्रियगर भाषा मृत्यु-सज्जा पर पड़ल अछि आ उचित इलाजक प्रतिक्षा मे  अपन अंतिम साँस गिनि रहल अछि   स्थिति चिंताजनक अछि ।  

मिथिलांचलक मधुर भाषा मैथिली तावत धरि बिलखैत रहतीह जावत धरि गाम-घर तथा प्रवास मे रहनिहार मैथिल लोकनिक कंठक भाषा नञि बनत । कतेक दुःखक गप्प अछि जे मिथिला-मैथिली सँ जुड़ल समारोह अथवा उत्सवक अवसर पर मैथिली मे बजबाक हेतु बेर-बेर अनुनय विनय कयलाक उपरान्तहुँ मैथिली मे गप्प  करबा सँ परहेज कयल जा रहल अछि हेतुए जे मैथिली मे गप्प कयला सँ स्टेट्स कम हेबाक भ्रामक एवं तथ्यहीन उदाहरण प्रस्तुत करबाक अनैतिक प्रयास कयल जाइत अछि । मैथिली भाषाक माध्यम सँ समाज मे वा अन्य स्थान पर स्वयं कें गौरवक अनुभव करी । बहुधा देखल जा रहल अछि जे गाम-घर तथा शहरी क्षेत्र मे मैथिली भाषाक प्रति विशेषरूप सँ नवयुवक व नवयुवती उदासीन-भाव रखैत अपन पूर्वज प्रदत्त भाषायी संस्कृति कें तिरस्कार कऽ रहला अछि । एहि प्रकारक उदासीन धारणा व भावना कहीं भाषाक महत्व कें वा स्वरूप कें नुकसान नञि कऽ दैक, विचारणीय तथा चिंताक बात अछि ।

ज्ञातव्य हो कि मैथिली भाषाक उत्थान मिथिलांचलक संस्कृतिक उत्थान थिक, मिथिलाक गौरवमयी इतिहासक उत्थान थिक तथा मिथिलांचलक मैथिल लोकनिक स्वाभिमानक उत्थान थिक । अत्यंत मधुर एवं प्रिय भाषा मैथिलीक संरक्षण तथा संबर्द्धनक आवश्यकता कें अनिवार्य रूप सँ नियोजित करबाक दायित्व मैथिल सेवी संगठनक अतिरिक्त प्रत्येक मैथिलक पावन कर्तव्य बनैत छन्हि जे भाषाक मर्यादा कें मर्यादित करबाक संकल्प सँ संकल्पित होइथ आ एहि प्राचीन भाषाक रक्षार्थ समाजक प्रत्येक वर्ग मे चेतनाक ज्योति प्रज्वलित करबाक हेतु कर्तव्य पथ के प्रशस्त करैथ ।

परमादरणीय श्री फूलचन्द्र झा 'प्रवीण' अपन कविताक माध्यमें मैथिली भाषाक वर्तमान स्थितिक वर्णन करैत लिखलनि अछि :

"जे भाषा एहि मुढ़ जगत के देलकै ज्ञानक पहिल किरन,
कानि रहल अछि बाट-घाट बौआ रहल अछि ओ रन-वन,
हहड़य ओकर हिय आंगन नित देखि पुत्र केर चालि-चलन,
आबहुं आलस त्याग करू प्राप्त करू सम्मान कें ।
कतेक दिवस अपमान सहब आब नञि सहबै अपमान कें...
जय मिथिला ! जय मैथिली !! जय मिथिला ! जय मैथिली !!

उक्त संदेश व्याकुल करैत अछि भाषाक प्रति अनासक्त, अनादर आ उपेक्षित भाव कें ।  की हमरालोकनिक प्रियगर भाषा शनैः - शनैः लुप्त भऽ जायत ? यक्ष प्रश्न सदैव चित्त आओर चेतना कें आंदोलित करैत अछि । विवशताक अन्हरगुप्पी मे समाधानक प्रयासक प्रति उदासीन भाव वस्तुतः भविष्यक नीक दिनक संकेत नञि प्राप्त करबाक भय सँ सशंकित छी एवं माँ मैथिली सँ प्रार्थना निवेदित करैत छी जे हमरालोकनिक बुद्धि, विवेक एवं व्यावहारिक चिंतन कें साकारात्मक परिवेश मे साक्षात्कार करबेबाक प्रेरणा प्रदान कय कर्तव्य मार्ग पर अग्रसर हेबाक शक्ति प्रदान करैथ ।