मधुश्रावणी-महात्म्य’

मिथिलाक संस्कृति पावन, पुनीत एवं पवित्र रहल अछि । अनेकों प्रकारक पवित्र उत्सवक संगम रहल अछि मिथिलांचल । मिथिला मे उत्सव मनेबाक विधि-विधान एवं वर्णन मिथिलाक पावन संस्कृति कें अनुपम श्रेष्ठताक परिचायक रहल अछि । “मधुश्रावणी” मिथिलाक ब्याहता भगिनीक पावन एवं पवित्र पाबैनक रूप मे एहि भूमिक आध्यात्मिक गौरव कें श्रेष्ठता प्रदान करैत अछि । अपन सुहागक रक्षा हेतु एवं अखंड सुहागबर्द्धनक निमित्त कठोर साधनाक माध्यम सँ विधि रचित लेखनी वा विधानक मान्यता कें बदलवाक सामर्थ्य वस्तुतः “मधुश्रावणी” सदृश पाबैनक गौरव-गाथाक मूल आधार थिक । मधुश्रावणी मनेबाक प्रचलन एवं कथाक संदर्भक ज्ञान सँ हमरालोकैन अवगत होई, आवश्यक बुझि उपलब्ध जानकारीक आधार पर कथा-संदर्भक निवेदन कऽ रहलौं अछि ।

मधुश्रावणी केर कथा एक नव ब्याहता युवतीक सुहाग-रक्षार्थ तथा कयल गेल कठोर व्रत आओर उपासनाक कथा थिक । कथा मे वर्णित अछि – एक राजा अपन पुत्रक दीर्घ आयुक रक्षा हेतु साधारण ग्रामीण ब्राह्मण युवती सँ वैवाहिक संबंध स्थापित करबाक निर्णय कयलनि । राजाक पुत्रक जन्मकुंडली मे सर्प-दंशक योग छल जाहि कारणें राजा सदिखन चिंतित रहैत छलाह । आचार्य एवं ज्योतिषक परामर्श छल जे एहि बालकक विवाह ओहि युवती सँ कराओल जेबाक चाही, जिनक सुहागक रेखा अखंड हो । विवाह सम्पन्न भेल । विवाह सम्पन्न भेला उपरांत विधि रचित विधान (जाहि मे सर्प-दंशक योग छल) कें पलटबाक हेतु कठोर व्रत व उपासनाक माध्यमें युवकक प्राण रक्षाक निमित्त साध्वी-स्वरूपा पत्नि अपन पतिक सेवा मे समर्पित भऽ नाग देवताक पूजा-अराधना मे तल्लीन रहैत छलीह । श्रावणक पंचमी सँ पन्द्रह दिनक उपरांत श्रावणक तृतीया के सर्प-दंशक योग छल एवं तृतीया कें ओहि बालकक मृत्यु सर्प- दंश सँ हयब निश्चित छल । परन्तु पतिक प्राण रक्षा हेतु पत्नि, कठोर व्रत एवं साधना करैत नित्य रात्रि समय धृतयुक्त दीप तैयार कय पतिक सिरहानाक समीप स्थापित करैत छलीह तथा नाग-देवताक पूजा-अर्चना करैत दीर्घ आयुक प्रार्थना सेहो करैत छलीह । पतिक आयुबर्द्धनक व्रत-परंपराक प्रति सम्पूर्ण समर्पणक कठोर साधना देखि नाग देवता अन्ततः प्रसन्न होइत छथि एवं युवतीक पातिव्रत धर्मक प्रति समर्पित निष्ठा सँ अभिभूत होइत वरदान स्वरूप पतिक प्राणदान वापस करैत विधाता द्वारा रचित रचना कें मिथ्या साबित करैत छथि । सारांशतः उपर्युक्त कथा एहि पवित्र पाबैनक मुख्य महात्म्य अछि ।

पूर्व एवं वर्तमान समय मे मधुश्रावणीक समय ब्याहता भगिनी सुन्दर परिधान सँ सुसज्जित होइत (सासुर सँ पठाएल गेल वस्त्र, श्रृंगारिक वस्तुजात आदि) सुन्दर डाली मे अनेकों प्रकारक सुगंधित पुष्प सँ श्रृंगार कय संगी-बहिनपाक संग समूहबद्ध होइत गीतनाद करैत फूल लोढ़बाक हेतु गामक देवस्थान मे एकत्रित होइत छथि । मधुश्रावणी मनेबाक दरम्यान एहि दिव्य दृश्यक अवलोकन हेतु वा उत्सवक रमणीयताक प्रतीक्षा स्वर्गक देवी-देवतागण सेहो करैत रहैत छथि । पन्द्रह दिनक कठोर व्रत पालन करैत आह्लाद व अनुरागपूर्वक एहि पाबैनक मधुर झांखी मिथिलांचलक गाम-गाम मे देखबाक ललक वस्तुतः भाग्यशाली व्यक्तिये कें प्राप्त होइत छन्हि । तैं हमरालोकैन नमन एवं वंदन करी एहि पवित्र पाबैन “मधुश्रावणी” कें जे मिथिलाक सामाजिक व सांस्कृतिक स्वरूप कें सदैव सँ त्याग आओर समर्पणक माध्यमें गौरवान्वित करैत आबि रहल अछि ।

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