मिथिलाक विभूति -‘किरणजी

भारतीय वाङ्गमय मे मिथिलाक महत्व सर्वोपरि अछि । मिथिलाक यश-पताका जनक, याज्ञवल्क्य, गौतम, कणाद, कुमारिल भट्ट, वाचस्पति मिश्र, उदयनाचार्य आदि छथि । ई लोकनि संस्कृतोक विद्वान रहथि ।

आधुनिक मिथिलाक विकास यात्रा प्रारम्भ होइछ 1880 ई. सँ । कपिश्वर चंदा झा द्वारा लिखित मैथिली भाषा रामायण सँ । बाल्मीकि रामायण व महाभारत ग्रंथक विभिन्न भाषा मे रचना सेहो भऽ गेल छल आ जाहि भाषा मे रामायण व महाभारतक रचना भेल तहिये सँ ओहि भाषाक विकास यात्रा आरंभ होइछ । मैथिली भाषा मे रामायणक रचना पछातिए भेल । मैथिली भाषाक विकास यात्रा कें आगु बढ़ौलनि बाबू भोलालाल दास, मिथिला केशरी जानकीनंदन सिंह, डा. कांचीनाथ झा ‘किरण’, पं. हरिश्चन्द्र मिश्र ‘मिथिलेन्दु’, डा. लक्ष्मण झा आदि ।

विभूति शब्दक अर्थ जे कोनो व्यक्ति द्वारा समाज मे विशिष्ट कार्यक सम्पादित करब होइछ । एहि विशिष्टताक हेतु ओ समाजक विभूति मे परिगणित भऽ जाइत छथि । एहि लेख मे चर्चा करब मिथिला समाज मे विशिष्ट काजक माध्यम सँ जन-जन कें हृदय मे सदाक लेल जगह बनेनिहार – कांचीनाथ झा ‘किरण’ जीक ।

किरण जीक जन्म 01 दिसम्बर,1906 ई. कें धर्मपुर, ऊजान, जिला – दरभंगा मे भेल छलनि । हिनक प्रारंभिक शिक्षा गामहि मे भेल । घरक आर्थिक स्थिति दयनीय छल । हिनक कुटुम्ब राजा टंक नाथ चौधरी, रजौड़ स्टेट (बंगलादेश) सँ जुड़ल छलाह । राजा साहेब गरीब आ मेधावी छात्र कें अपना ओहिठाम राखि पढ़ाबैथ । किरणजी ओहिठाम सँ मैट्रिक पास कयलनि । मैट्रिक पास कयला उपरांत किरणजी बनारस सँ आयुर्वेदाचार्य भेला सन् 1935 ई. मे । बनारस मे आयुर्वेद कओलेज मे प्राध्यापकक चाकरी भेट गेलनि ।

मिथिला भाषा मे रामायणक रचना भेला सँ प्रवासी मैथिल मे जागृति आयल । 1905 ई. मे जयपुर (राजस्थान) सँ विद्या वाचस्पति मधुसूदन झा ‘मैथिल हित साधन’ पत्रिकाक प्रकाशन आरम्भ कयलनि । 1906 ई. मे बनारस सँ महामहोपाध्याय मुरलीधर झा ‘मिथिला मोद पत्रिकाक’ शंखनाद कयलनि । तहिया बनारस संस्कृतक पठन-पाठनक केन्द्र छल । पछांति 1908 ई. मे दरभंगा राज सँ ‘ मिथिला मिहिरक’ प्रकाशन प्रारम्भ भेल । चमत्कार भेल कोलकाता मे, जखन 1919 ई. मे कोलकाता विश्वविद्यालय मे मैथिली भाषाक मान्यता एम. ए. धरि भेटल । एकर श्रेय जाइत छनि पुरनियां निवासी ब्रजमोहन ठाकुर जीकें । ठाकुरजी पेशा सँ वकील छलाह ।

1930 ई. मे मदनमोहन मालवीयजी द्वारा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालयक स्थापना भेल । 1950 ई. मे किरण जीक नेतृत्व मे एक प्रतिनिधिमंडल मालवीयजी सँ भेंट कयलक । मालवीयजी कहलथिन जे हम अहाँक भाषा कें मान्यता पूर्वहिं दऽ देलौं । मालवीय जीक इशारा हिन्दी सँ छलनि । किरणजी कहलथिन – जे हमर भाषा हिन्दी नहि अपितु मैथिली थिक । की अपने हमर भाषा बुझि जयबैक ? मालवीयजी सहर्ष स्वीकार करैत कहलथि – ‘जे हम अहाँक भाषा सुगमतापूर्वक बुझैत छी । ‘तखन ठीक छैक, अपने बकरी कें शोर पाड़ियौक।’ मालवीयजी बकरी के ‘इधर आओ’ कहलथिन । पुनः हुनका सँ कहल गेलैन्ह जे बकरी के बैलेबियौ । मालवीयजी फेर बकरी कें कहलथिन – ‘उधर जाओ ।’ ई लोकनि कहलथिन जे मैथिली मे बकरी कें बजाओल जेबाक लेल ‘हर्र-हर्र’ कहल जाइत छैक, तहिना ‘लिह-लिह’ कहि बकरी कें बैलाओल जाइत छैक । मालवीयजी अचंभित आ स्तब्ध रहि गेलाह । फेर ई लोकनि ‘अईठार, चिनुआर’ आदि शब्दक प्रयोग कयलथिन । मालवीयजी गुम्मे रहि गेलाह आ तत्क्षण 1935 ई. मे बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय मे मैथिली भाषाक मान्यता एम ए धरि भेटल ।

दरभंगा मे बाबू भोलालाल दास, मैथिलीक विकासक बीड़ा उठौने रहथि । हिनक संस्था छल – ‘मैथिली साहित्य परिषद् ।’ परिषद् संरक्षित रहय दरभंगा राज सँ । 1939 ई. मे पटना विश्वविद्यालय मे मैथिली कें स्वीकृति भेटल मैट्रिक धरि । आब मैथिली हाई स्कूलक भाषा भऽ गेल आ कालांतर मे बीए, एमए तथा पीएचडी मैथिली मे होमय लागल ।

मैथिलीक विकास जाधरि मिथिलाक माइट-पाइन पर नहि हयत ताधरि मैथिलीक विकास स्वप्नवते रहत । ई सोचि किरणजी प्राध्यापकीय चाकरी कें तिलांजली देलैन आ आबि गेलाह गाम । मैट्रिक पास रहैथ तैं सरिसब हाई स्कूल मे मास्टर भऽ गेलाह । गाम मे मास्टर भऽ गेला सँ छात्र लोकनि सँ संबंध जोड़लनि । क्षेत्रक प्रबुद्ध मैथिल प्रेमी कें संङौर कयलनि आ ‘विद्यापति परिषद्क’ गठन कयलनि । क्षेत्र मे जन-जागरण अभियान प्रारम्भ कयलनि । एक दिश जागरण अभियान आ दोसर दिश आई ए, बीए, एमए आ पीएचडी कयलनि किरणजी । तत्पश्चात् किरणजी हाई स्कूल सँ इस्तीफा दऽ चन्द्रधारी मिथिला कओलेजक प्राध्यापक भेलाह । किरणजी मैथिली साहित्य मे कविता, कथा, उपन्यास आदि लिखलनि । सरिपहुं किरणजी मिथिलाक विभूति थिकाह जे मानव जीवन कें सार्थक कयलनि । तिल-तिल कें जड़ैत मैथिल समाज कें प्रकाश दैत रहलाह । 1989 ई. मे साहित्य अकादमी पुरस्कार सम्मान सँ सम्मानित भेलाह ‘मैथिली महाकाव्यक’ रचना कय कें ।

किरण जीक स्वाभाव आ सामीप्यक चर्चा करैत श्रद्धेय श्री कमलेश झाजी एक संस्मरण सुनेलथि । सुनू हुनकहिं शब्द मे -1985 ई. क बात थिक । किरणजी गाम मे आजीवन ‘जानकी नवमी’ मनाबैथ । हम, मैथिलीपुत्र प्रदीप जीक संगे पुअर होम, दरभंगा मे रहैथ छलौं । प्रदीपजी कहलनि – चलु कमलेशजी, किरण जीक गाम । 12 बजे ट्रेन छै । दरभंगा रेलवे टीसन पर भीम भाई ( डा. भीमनाथ झा) संग भऽ गेलाह । सकरी पहूँच गेल रहि । रहिका सँ उदय चन्द्र झा ‘विनोद’ आदि सकरी आबि गेल रहथि । सकरी सँ झंझारपुर जाय वाली रेलगाड़ीक परिचालन कोनो कारणवश बंद रहैक । सकरी टीसन पर हमरालोकनि ढ़ठा गेलौं । अगत्या एकटा गाड़ी सकरी सँ आठ बजे राति मे खुजल आ हमरालोकनि लोहना टीसन उतरि सभा-स्थल पर पहुँचलौं । सभाक अंतिम बिध भऽ रहल छलैक अर्थात् अध्यक्षीय अभिभाषण । एतेक लोक के देखैत देरि किरणजी सभा कें चालू रखबाक आदेश देलथिन । हमरालोकनि भाषण-भूषण देलौं । भोजनोपरांत रात्रि विश्राम सभा-स्थले पर भेल । चन्द्रभानू सिंह कें घोंघडीहा जेबाक छलनि । चन्द्रभानू सिंह कें परातिए नींद टूटल । प्रदीपजी अपन गाम कथबार चलि गेलाह । मधेपुर कओलेज सँ आयल प्रो. देवकांत मिश्र रहि गेल छलथि । 6 बजे हम आओर चन्द्रभानू सिंह, किरणजी सँ आर्शीवाद लेबाक हेतु हुनका दलान पर पहुँच जाइत छी । रेलगाड़ी आठ बजे भिनसरे छैक । साढ़े सात बजे हम आ चन्द्रभानू सिंह महाकवि किरण जीकें प्रणाम कऽ बिदा लैत छी । टीसनक पूब पाकड़ि गाछक चबुतरा पर गाड़ीक प्रतीक्षा मे बैस जाइत छी । एतबहिं काल मे हमरालोकनि देखैत छी जे आदरणीय किरणजी टुघरल-टुघरल बेंत खटखटाबैत चलि आबि रहल छथि । लऽग एला पर कहलिएनि जे – अपने एबाक कष्ट कियेक केलियैक ? अहींक लऽग सँ तऽ हमरालोकनि आयले रहि । किरणजी कहलनि – कार्यकर्त्ता टीसन पर रहैथ आ हम दलान पर रहि ? ई हमरा बर्दाश्त नहि अछि ।

किरणजी नहि बैसलाह । ओ ठारे-ठार अपन अतीत मे हेरा गेलाह । कहय लगलाह – जे जन जागरण अभियान पहिने सप्ताह व्यापी तखन पखवार व्यापी पुनः मास व्यापी चलौने रहि । हमरा संग मे सभ बेमार पड़ैत गेलाह आ हमहुँ सत्ताइसम् दिन बेमार पड़ि गेलौं । पूछलिएन्हि कोना जन जागरण अभियान चलबैत रहियैक ? किरणजी बजला – स्कूल सँ जखन चारि बजे बेरिया मे छुट्टी हुअय तखन अपन साइकिलक कैरियर पर सतरंजी बान्हि ली । गामक चौबटिया पर सतरंजी पसारि कविता आ भाषण करी । राति मे नौ-दस बजे घर घूमि । आ ककरौ ओहिठाम अन्न ग्रहण नहि करी । चायक प्रथा रहबे नहि करैय । धोखा धोखी सँ कदाचित पानि पिया जाय । इएह रहय जन-जागरण अभियान । ता गाड़ी आबि चुकल छल आ हमरालोकनि भारी मोने एहेन मैथिली विभूति सँ बिदा लेलौं । किरणजी 09 अप्रैल, 1989 कें सदाक लेल हमरा सभ सँ बिदा लय महाप्रस्थान कयलनि

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