स्व. श्री वैद्यनाथ मिश्र “यात्री” (१९११-१९९८)

स्व. श्री वैद्यनाथ मिश्र “यात्री” केर जन्म १९११ ई. मे अपन मामागाम सतलखामे भेलन्हि, जे हुनकर गाम तरौनीक समीपहिमे अछि। यात्री जी अपन गामक संस्कृत पाठशालामे पढ़ए लगलाह, फेर ओऽ पढ़बाक लेल वाराणसी आऽ कलकत्ता सेहो गेलाह आऽ संस्कृतमे “साहित्य आचार्य” केर उपाधि प्राप्त कएलन्हि।

तकर बाद ओऽ कोलम्बो लग कलनिआ स्थान गेलाह पाली आऽ बुद्ध धर्मक अध्ययनक लेल। ओतए ओऽ बुद्धधर्ममे दीक्षित भए गेलाह आऽ हुनकर नाम पड़लन्हि नागार्जुन। यात्रीजी मार्क्सवादसँ प्रभावित छलाह। १९२९ ई. क अन्तिम मासमेमे मैथिली भाषामे पद्य लिखब शुरू कएलन्हि यात्री जी। १९३५ ई.सँ हिन्दीमे सेहो लिखए लगलाह।

स्वामी सहजानन्द सरस्वती आऽ राहुल सांकृत्यायनक संग ओऽ किसान आन्दोलनमे संलग्न रहलाह आऽ १९३९ सँ १९४१ धरि एहि क्रममे विभिन्न
जेलक यात्रा कएलन्हि। हुनकर बहुत रास रचना जे महात्मा गाँधीक मृत्युक बाद लिखल गेल छल, प्रतिबन्धित कए देल गेल।

भारत-चीन युद्धमे कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा चीनकेँ देल समर्थनक बाद यात्रीजीक मतभेद कम्युनिस्ट पार्टीसँ भए गेलन्हि। जे.पी. अन्न्दोलनमे भाग लेबाक कारण आपात्कालमे हिनका जेलमे ठूसि देल गेल। यात्रीजी हिन्दीमे बाल साहित्य सेहो लिखलन्हि। हिन्दी आऽ मैथिलीक अतिरिक्त बांग्ला आऽ संस्कृतमे
सेहो हिनकर लेखन आएल। मैथिलीक दोसर साहित्य अकादमी पुरस्कार १९६९ ई. मे यात्रीजीकेँ हुनकर कविता संग्रह “पत्रहीन नग्न गाछ”पर भेटलन्हि।

१९९४ ई.मे हिनका साहित्य अकादमीक फेलो नियुक्त कएल गेल।
यात्रीजी जखन २० वर्षक छलाह तखन १२ वर्षक कान्यासँ हिनकर विवाह भेल। हिनकर पिता गोकुल मिश्र अपन समाजमे अशिक्षितक गिनतीमे छलाह, मुदा चरित्रहीन छलाह। यात्रीजीक बच्चाक स्मृति छन्हि, जे हुनकर पिता कोना हुनकर अस्वस्थ आऽ ओछाओन धेने मायपर कुरहड़ि लए मारबाक लेल उठल छलाह, जखन ओऽ बेचारी हुनकासँ अपन चरित्रहीनता छोड़बाक गुहारि कए रहल छलीह।

यात्रीजी मात्र छ वर्षक छलाह जखन हुनकर माए हुनका छोड़ि प्रयाण कए गेलीह। यात्रीजीकेँ अपन पिताक ओऽ चित्र सेहो रहि-रहि सतबैत रहलन्हि जाहिमे हुनकासँ मातृवत प्रेम करएबाली हुनकर विधवा काकीक, हुनकर पिताक अवैध सन्तानक गर्भपातमे, लगभग मृत्यु भए गेल छलन्हि। के एहन पाठक होएत जे यात्रीजीक हिन्दीमे लिखल “रतिनाथ की चाची” पढ़बाक काल बेर-बेर नहि कानल होएताह। पिता-पुत्रक ई घमासान एहन बढ़ल जे पुत्र अपन बाल-पत्नीकेँ पिता लग छोड़ि वाराणसी प्रयाण कए गेलाह।

कर्मक फल भोगथु बूढ़ बाप हम टा संतति, से हुनक पाप ई जानि ह्वैन्हि जनु मनस्ताप अनको बिसरक थिक हमर नाम माँ मिथिले, ई अंतिम प्रणाम! (काशी/ नवंबर १९३६) काशीसँ श्रीलंका प्रयाण “कर्मक फल भोगथु बूढ़ बाप” ई कहि यात्रीजी अपन पिताक प्रति सभ उद्गार बाहर कए दैत छथि। १९४१ ई. मे यात्रीजी पत्नी, अपराजिता, लग आबि गेलथि।
१९४१ ई. मे यात्रीजी दू टा मैथिली कविता लिखलन्हि- “बूढ़ वर” आऽ विलाप आऽ एकरा पाम्फलेट रूपमे छपबाए ट्रेनक यात्री लोकनिकेँ बेचलन्हि।जीविकाक ताकिमे सौँसे भारत दुनू प्राणी घुमलाह। पत्नीक जोर देलापर बीच- बीचमे तरौनी सेहो घुमि कए आबथि। आऽ फेर अएल १९४९ ई. अपना संग लेने यात्रीजीक पहिल मैथिली कविता-संग्रह “चित्रा”।

१९५२ ई. धरि पत्नी संगमे घुमैत रहलथिन्ह, फेर तरौनीमे रहए लगलीह। यात्रीजी बीच- बीचमे आबथि। अपराजितासँ यात्रीजीकेँ छह टा सन्तान भेलन्हि, आऽ सभक सभ भार ओऽ अपना कान्हपर लेने रहलीह। यात्रीजी दमासँ परेशान रहैत छलथि। हम जखन दरभंगामे पढ़ैत रही तँ यात्रीजी ख्वाजा सरायमे रहैत छलाह। हमरा मोन अछि जे मैथिलीक कोनो कार्यक्रममे यात्रीजी आएल छलाह आऽ कम्युनिस्ट पार्टीबला सभ एजेन्डा छीनि लेने छल।

अगिले दिन यात्रीजी अपनाकेँ ओहि धोधा- धोखीमे गेल सभाक कार्यवाहीसँ हटा लेलन्हि। एमर्जेन्सीमे जेल गेलाह तँ आर.एस.एस. केर कार्यकर्ता लोकनिसँ जेलमे भेँट भेलन्हि। आऽ जे.पी.क सम्पूर्ण क्रान्तिक विरुद्ध सेहो जेलसँ बाहर अएलाक बाद लिखलन्हि यात्रीजी।

यात्रीजी मैथिलीमे बैद्यनाथ मिश्र “यात्री” आऽ हिन्दीमे नागार्जुन केर नामसँ रचना लिखलन्हि। “पृथ्वी ते पात्रं” १९५४ ई. मे “वैदेही”मे प्रकाशित भेल छल, हमरा सभक मैट्रिकक सिलेबसमे छल। यात्रीजी लिखैत छथि- “आन पाबनि तिहार तँ जे से। मुदा नबान निर्भूमि परिवारकेँ देखार कए दैत छैक। से कातिक अबैत देरी अपराजिता देवीक घोघ लटकि जाइन्हि। कचोटेँ पपनियो नहि उठा होइन्ह ककरो दिश! बेसाहल अन्नसँ कतउ नबान भेलइए”?

आऽ अन्तमे यात्रीजीक संस्कृत
पद्य:- वासन्ती कनकप्रभा प्रगुणिता
पीतारुर्णेः पल्लवैः
हेमाम्भोजविलासविभ्रमरता
दूरे द्विरेफाः स्ता
यैशसण्डलकेलिकानन कथा
विस्मरिता भूतले
छायाविभ्रमतारतम्यतरलाः
तेऽमी “चिनार” द्रुमाः॥
बसंतक स्वर्णिम आभा द्विगुणित भऽ गेल
अछि पीयर-लाल कोपड़सँ। स्वर्णकाल भ्रममे
भौरा सभ एकरासँ दूर-दूर रहैत अछि। नन्दनवनक विहार जे
पृथ्वीपर बिसारि दैत छथि, छाह झिलमिल घटैत-बढ़ैत
जिनक डोलब अछि चंचल आ तरल। ओही चिनारकेँ
हम देखने छी अडिग भेल ठाढ़।

सौजन्य सँ : ।। मिथिला मंथन ।।

गोनू झा

गोनू बाबू सेहो मिथिलाक विभूति छथि । हिनक एक सँ एक किस्सा धिया-पुता मे सुनबाक सौभाग्य प्रायः सभ गोटे कें प्राप्त भेल होयत । प्रस्तुत अछि गोनू बाबू सँ जुड़ल एक किस्सा, जाहि मे गोनू बाबूक विलक्षण बुद्धिक प्रखरता लक्षित होइत अछि ।

माघ मासक अन्हरिया राति । संगहि बदरी-बेकालक समय सेहो । बरखा रूकबाक नाम नहि लैत छल । सन-सन बहैत सर्द हवा । सर्दक प्रकोप सँ शरीरक हड्डी सातो स्वर मे अपन वेदना व्यक्त करबाक लेल विवश छल । एहेन प्रलयकारी अन्हरिया रातिक समय चारिटा जुआयल चोर गोनू बाबूक घर मे चोरी करबाक निमित्त सुतयवला घर मे प्रवेश कयलक । आ जाहि चौकी पर गोनू बाबू रात्रि विश्राम करैत छलाह ताहि चौकीक नीचां चारू चोर व्यग्रता सँ प्रतीक्षा क’ रहल छल जे गोनू बाबू दुनू पराणी शीध्र निंद्रा देवीक आगोश मे नींद परैथ । नीचां चोर लोकनि एहि प्रकारक सोच मे व्यग्र छलाह एम्हर चौकी पर बैसल गोनू बाबू कें भांज लागि गेलैन्ह जे किछु अज्ञात आगन्तुक, घर के सुड्डाह करबाक उद्वेश्य सँ चौकीक नीचां हमरा लोकनि कें आराम करबाक प्रतीक्षा क’ रहल अछि ।

गोनू बाबूक तीक्ष्ण बुद्धि एहि चोर कें पकड़बाक योजना तैयार करय लागल । अपन धर्मपत्नी कें सस्नेह पूछैत गोनू बाबू बजला – ‘यै, कतेक दिनसँ हमर मोन अहाँ सँ किछु प्रश्न पुछबाक हेतु आतुर अछि ।’ आई जे किछु पुछब तकर जबाव देमय पड़त । पत्नी कहलथिन – पुछू ने, की पूछबाक अछि ? गोनू बाबू बजला – संतान नहि भेल अछि । जँ भोलाबाबाक कृपा सँ संतान रत्न केर प्राप्ति हयत तखन बच्चा सभहक नाम की रखबैक ? पत्नी बजली – धुर जाऊ ! संतान भेबे नहि कयल आ नाम की रखबै तकर चिंता करैत छी ? परन्तु गोनू बाबू बेर-बेर आग्रहपूर्वक जबाव देबाक हठ करय लगलाह । अन्ततः पत्नी कहलथिन – अहीं नाम राखि दियौ ने !

गोनू बाबू बजलाह – भेल ने ! हमहीं नाम राखि दैत छियैक । नामकरण संस्कार प्रारम्भ भेल । पहिल बच्चाक नाम रविकांत, दोसर बच्चाक नाम घोघर तेसर बच्चाक नाम धोधर आ चारिम बच्चाक नाम चोर रखलनि । पत्नी सँ गोनू झा कहलनि – नाम पसिन अछि ने ? राति बेशी भ’ रहल छलैक । गोनू बाबूक धर्मपत्नी कें औंघही लागि गेल छलन्हि । बजली – ठीक छै नाम राखि देलियै ने, आब आराम करू । राति बेशी भ’ गेल अछि ।

गोनू बाबू पुनः बजला – हे यै ! जँ बच्चा सभ बाहर खेलेबाक लेल गेल हो तखन कोना गर्द कयके बजायब बच्चा सभके ? धर्मपत्नी कहलथिन – अहाँके जे मन फुड़ैये से करू । हमरा नींद सँ आँखि नहि खुलि रहल अछि । एम्हर चौकीक नीचां चोर सभ दुनू दम्पतिक वार्त्तालाप सुनि रहल अछि सकदम्ब भ’ के । गोनू बाबू द्वारा जे नामकरण कयल गेल छल ओहि नामक व्यक्ति हुनक पड़ोस आ अगल-बगल मे रहअवला व्यक्तियेक नाम छलन्हि । गोनू बाबू घर सँ निकलि आँगन एलथि । आ जोर सँ गर्द करअ लगलाह – रविकांत, घोघर, धोधर – चोर हौ….ऊ । दू-तीन बेर जोर-जोर सँ गर्द करितहिं अगल- बगल सँ आबाज आबय लागल – कक्का ! कक्का, कतअ चोर अछि यौ । बाजू- बाजू कतअ चोर अछि । एवम् प्रकारेण आस पड़ोसक लोक सभगोटे आँगन मे जमा भ’ गेलाह । गोनू बाबू किछु व्यक्तिक संग घरक भीतर एला आ संकेत सँ चौकीक नीचां बैसल चारू चोर दिश इशारा करैत बजला – यौ सरकार, अपने लोकनि चारि घंटा सँ बड्ड बेशी कष्ट आ शिकस्त जगह मे बैसल छी । पीठ सेहो दर्द करैत हयत । निहुड़ी के चोर के सम्बोधित करैत गोनू बाबू चोर सँ कहैत छथि – औजी समांग ! अहाँ सभ क्यो बाहर निकलू ने । चुक्की माली बैसल-बैसल पीठ अकड़ि गेल हयत ।

एहि प्रकारें गोनू बाबू अपन विलक्षण आ तीक्ष्ण बुद्धिक बलें चोर कें पकड़बेलथि । गोनू झा सँ संबंधित अनेकों किस्सा-पिहानी मिथिला मे चर्चित अछि । वर्त्तमान समय मे हमरालोकनिक दुर्भाग्य जे पुरातन चिंतनक सुखद क्षण क्रमशः विलीन भ’ रहल अछि आ सभ किछु नेपथ्य मे समाहित भ’ चुकल अछि । कथा, किस्सा, पिहानी के मोन पाड़ैत हमरालोकनि किछु समय धरि अतीतक सुखद आनंद लेबाक प्रयास करैत छी आ कल्पना लोक मे विचरण करबाक प्रयास करैत छी

मिथिलाक विभूति -‘किरणजी

भारतीय वाङ्गमय मे मिथिलाक महत्व सर्वोपरि अछि । मिथिलाक यश-पताका जनक, याज्ञवल्क्य, गौतम, कणाद, कुमारिल भट्ट, वाचस्पति मिश्र, उदयनाचार्य आदि छथि । ई लोकनि संस्कृतोक विद्वान रहथि ।

आधुनिक मिथिलाक विकास यात्रा प्रारम्भ होइछ 1880 ई. सँ । कपिश्वर चंदा झा द्वारा लिखित मैथिली भाषा रामायण सँ । बाल्मीकि रामायण व महाभारत ग्रंथक विभिन्न भाषा मे रचना सेहो भऽ गेल छल आ जाहि भाषा मे रामायण व महाभारतक रचना भेल तहिये सँ ओहि भाषाक विकास यात्रा आरंभ होइछ । मैथिली भाषा मे रामायणक रचना पछातिए भेल । मैथिली भाषाक विकास यात्रा कें आगु बढ़ौलनि बाबू भोलालाल दास, मिथिला केशरी जानकीनंदन सिंह, डा. कांचीनाथ झा ‘किरण’, पं. हरिश्चन्द्र मिश्र ‘मिथिलेन्दु’, डा. लक्ष्मण झा आदि ।

विभूति शब्दक अर्थ जे कोनो व्यक्ति द्वारा समाज मे विशिष्ट कार्यक सम्पादित करब होइछ । एहि विशिष्टताक हेतु ओ समाजक विभूति मे परिगणित भऽ जाइत छथि । एहि लेख मे चर्चा करब मिथिला समाज मे विशिष्ट काजक माध्यम सँ जन-जन कें हृदय मे सदाक लेल जगह बनेनिहार – कांचीनाथ झा ‘किरण’ जीक ।

किरण जीक जन्म 01 दिसम्बर,1906 ई. कें धर्मपुर, ऊजान, जिला – दरभंगा मे भेल छलनि । हिनक प्रारंभिक शिक्षा गामहि मे भेल । घरक आर्थिक स्थिति दयनीय छल । हिनक कुटुम्ब राजा टंक नाथ चौधरी, रजौड़ स्टेट (बंगलादेश) सँ जुड़ल छलाह । राजा साहेब गरीब आ मेधावी छात्र कें अपना ओहिठाम राखि पढ़ाबैथ । किरणजी ओहिठाम सँ मैट्रिक पास कयलनि । मैट्रिक पास कयला उपरांत किरणजी बनारस सँ आयुर्वेदाचार्य भेला सन् 1935 ई. मे । बनारस मे आयुर्वेद कओलेज मे प्राध्यापकक चाकरी भेट गेलनि ।

मिथिला भाषा मे रामायणक रचना भेला सँ प्रवासी मैथिल मे जागृति आयल । 1905 ई. मे जयपुर (राजस्थान) सँ विद्या वाचस्पति मधुसूदन झा ‘मैथिल हित साधन’ पत्रिकाक प्रकाशन आरम्भ कयलनि । 1906 ई. मे बनारस सँ महामहोपाध्याय मुरलीधर झा ‘मिथिला मोद पत्रिकाक’ शंखनाद कयलनि । तहिया बनारस संस्कृतक पठन-पाठनक केन्द्र छल । पछांति 1908 ई. मे दरभंगा राज सँ ‘ मिथिला मिहिरक’ प्रकाशन प्रारम्भ भेल । चमत्कार भेल कोलकाता मे, जखन 1919 ई. मे कोलकाता विश्वविद्यालय मे मैथिली भाषाक मान्यता एम. ए. धरि भेटल । एकर श्रेय जाइत छनि पुरनियां निवासी ब्रजमोहन ठाकुर जीकें । ठाकुरजी पेशा सँ वकील छलाह ।

1930 ई. मे मदनमोहन मालवीयजी द्वारा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालयक स्थापना भेल । 1950 ई. मे किरण जीक नेतृत्व मे एक प्रतिनिधिमंडल मालवीयजी सँ भेंट कयलक । मालवीयजी कहलथिन जे हम अहाँक भाषा कें मान्यता पूर्वहिं दऽ देलौं । मालवीय जीक इशारा हिन्दी सँ छलनि । किरणजी कहलथिन – जे हमर भाषा हिन्दी नहि अपितु मैथिली थिक । की अपने हमर भाषा बुझि जयबैक ? मालवीयजी सहर्ष स्वीकार करैत कहलथि – ‘जे हम अहाँक भाषा सुगमतापूर्वक बुझैत छी । ‘तखन ठीक छैक, अपने बकरी कें शोर पाड़ियौक।’ मालवीयजी बकरी के ‘इधर आओ’ कहलथिन । पुनः हुनका सँ कहल गेलैन्ह जे बकरी के बैलेबियौ । मालवीयजी फेर बकरी कें कहलथिन – ‘उधर जाओ ।’ ई लोकनि कहलथिन जे मैथिली मे बकरी कें बजाओल जेबाक लेल ‘हर्र-हर्र’ कहल जाइत छैक, तहिना ‘लिह-लिह’ कहि बकरी कें बैलाओल जाइत छैक । मालवीयजी अचंभित आ स्तब्ध रहि गेलाह । फेर ई लोकनि ‘अईठार, चिनुआर’ आदि शब्दक प्रयोग कयलथिन । मालवीयजी गुम्मे रहि गेलाह आ तत्क्षण 1935 ई. मे बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय मे मैथिली भाषाक मान्यता एम ए धरि भेटल ।

दरभंगा मे बाबू भोलालाल दास, मैथिलीक विकासक बीड़ा उठौने रहथि । हिनक संस्था छल – ‘मैथिली साहित्य परिषद् ।’ परिषद् संरक्षित रहय दरभंगा राज सँ । 1939 ई. मे पटना विश्वविद्यालय मे मैथिली कें स्वीकृति भेटल मैट्रिक धरि । आब मैथिली हाई स्कूलक भाषा भऽ गेल आ कालांतर मे बीए, एमए तथा पीएचडी मैथिली मे होमय लागल ।

मैथिलीक विकास जाधरि मिथिलाक माइट-पाइन पर नहि हयत ताधरि मैथिलीक विकास स्वप्नवते रहत । ई सोचि किरणजी प्राध्यापकीय चाकरी कें तिलांजली देलैन आ आबि गेलाह गाम । मैट्रिक पास रहैथ तैं सरिसब हाई स्कूल मे मास्टर भऽ गेलाह । गाम मे मास्टर भऽ गेला सँ छात्र लोकनि सँ संबंध जोड़लनि । क्षेत्रक प्रबुद्ध मैथिल प्रेमी कें संङौर कयलनि आ ‘विद्यापति परिषद्क’ गठन कयलनि । क्षेत्र मे जन-जागरण अभियान प्रारम्भ कयलनि । एक दिश जागरण अभियान आ दोसर दिश आई ए, बीए, एमए आ पीएचडी कयलनि किरणजी । तत्पश्चात् किरणजी हाई स्कूल सँ इस्तीफा दऽ चन्द्रधारी मिथिला कओलेजक प्राध्यापक भेलाह । किरणजी मैथिली साहित्य मे कविता, कथा, उपन्यास आदि लिखलनि । सरिपहुं किरणजी मिथिलाक विभूति थिकाह जे मानव जीवन कें सार्थक कयलनि । तिल-तिल कें जड़ैत मैथिल समाज कें प्रकाश दैत रहलाह । 1989 ई. मे साहित्य अकादमी पुरस्कार सम्मान सँ सम्मानित भेलाह ‘मैथिली महाकाव्यक’ रचना कय कें ।

किरण जीक स्वाभाव आ सामीप्यक चर्चा करैत श्रद्धेय श्री कमलेश झाजी एक संस्मरण सुनेलथि । सुनू हुनकहिं शब्द मे -1985 ई. क बात थिक । किरणजी गाम मे आजीवन ‘जानकी नवमी’ मनाबैथ । हम, मैथिलीपुत्र प्रदीप जीक संगे पुअर होम, दरभंगा मे रहैथ छलौं । प्रदीपजी कहलनि – चलु कमलेशजी, किरण जीक गाम । 12 बजे ट्रेन छै । दरभंगा रेलवे टीसन पर भीम भाई ( डा. भीमनाथ झा) संग भऽ गेलाह । सकरी पहूँच गेल रहि । रहिका सँ उदय चन्द्र झा ‘विनोद’ आदि सकरी आबि गेल रहथि । सकरी सँ झंझारपुर जाय वाली रेलगाड़ीक परिचालन कोनो कारणवश बंद रहैक । सकरी टीसन पर हमरालोकनि ढ़ठा गेलौं । अगत्या एकटा गाड़ी सकरी सँ आठ बजे राति मे खुजल आ हमरालोकनि लोहना टीसन उतरि सभा-स्थल पर पहुँचलौं । सभाक अंतिम बिध भऽ रहल छलैक अर्थात् अध्यक्षीय अभिभाषण । एतेक लोक के देखैत देरि किरणजी सभा कें चालू रखबाक आदेश देलथिन । हमरालोकनि भाषण-भूषण देलौं । भोजनोपरांत रात्रि विश्राम सभा-स्थले पर भेल । चन्द्रभानू सिंह कें घोंघडीहा जेबाक छलनि । चन्द्रभानू सिंह कें परातिए नींद टूटल । प्रदीपजी अपन गाम कथबार चलि गेलाह । मधेपुर कओलेज सँ आयल प्रो. देवकांत मिश्र रहि गेल छलथि । 6 बजे हम आओर चन्द्रभानू सिंह, किरणजी सँ आर्शीवाद लेबाक हेतु हुनका दलान पर पहुँच जाइत छी । रेलगाड़ी आठ बजे भिनसरे छैक । साढ़े सात बजे हम आ चन्द्रभानू सिंह महाकवि किरण जीकें प्रणाम कऽ बिदा लैत छी । टीसनक पूब पाकड़ि गाछक चबुतरा पर गाड़ीक प्रतीक्षा मे बैस जाइत छी । एतबहिं काल मे हमरालोकनि देखैत छी जे आदरणीय किरणजी टुघरल-टुघरल बेंत खटखटाबैत चलि आबि रहल छथि । लऽग एला पर कहलिएनि जे – अपने एबाक कष्ट कियेक केलियैक ? अहींक लऽग सँ तऽ हमरालोकनि आयले रहि । किरणजी कहलनि – कार्यकर्त्ता टीसन पर रहैथ आ हम दलान पर रहि ? ई हमरा बर्दाश्त नहि अछि ।

किरणजी नहि बैसलाह । ओ ठारे-ठार अपन अतीत मे हेरा गेलाह । कहय लगलाह – जे जन जागरण अभियान पहिने सप्ताह व्यापी तखन पखवार व्यापी पुनः मास व्यापी चलौने रहि । हमरा संग मे सभ बेमार पड़ैत गेलाह आ हमहुँ सत्ताइसम् दिन बेमार पड़ि गेलौं । पूछलिएन्हि कोना जन जागरण अभियान चलबैत रहियैक ? किरणजी बजला – स्कूल सँ जखन चारि बजे बेरिया मे छुट्टी हुअय तखन अपन साइकिलक कैरियर पर सतरंजी बान्हि ली । गामक चौबटिया पर सतरंजी पसारि कविता आ भाषण करी । राति मे नौ-दस बजे घर घूमि । आ ककरौ ओहिठाम अन्न ग्रहण नहि करी । चायक प्रथा रहबे नहि करैय । धोखा धोखी सँ कदाचित पानि पिया जाय । इएह रहय जन-जागरण अभियान । ता गाड़ी आबि चुकल छल आ हमरालोकनि भारी मोने एहेन मैथिली विभूति सँ बिदा लेलौं । किरणजी 09 अप्रैल, 1989 कें सदाक लेल हमरा सभ सँ बिदा लय महाप्रस्थान कयलनि